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शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

टोटम और गोत्र प्रथा आदिम प्रकृति धर्म से जुडाव की महतवपूर्ण कड़ी

आदिवासी सामाजिक संरचना और सामाजिक सुदृढ़ता स्थापित करने में गोत्र और टोटम का महतवपूर्ण योगदान है |
गोत्र का अर्थ :-गोत्र शब्द की उत्पत्ति ''गेलिक'' शब्द से हुई है जो की यूरोप में स्थित स्काटलैंड के पहाड़ी लोगों की भाषा से संबधित है जिसका तात्पर्य वंशज से होता है |इस प्रकार मूल रूप में इसका संदर्भ एक सजातीय वंशानुक्रम समूह से है |मजुमदार ने गोत्र की परिभाषा करते हुए कहा है की <बहुधा एक गोत्र कुछ वंशों का योग होता है, जिसकी उत्पत्ति एक कल्पित पूर्वज से सम्बध्द होती है |यह पूर्वज मानव,मानव तुल्य कोई कल्पित, जीवित/मृत सत्व,पशु,पेड़-पौधा,घटना,स्थान एवं निर्जीव वस्तु तक हो सकता है |प्रत्येक आदिवासी समूह के गोत्र की उत्पत्ति से संबंधित कहानियां प्रचलित है |यही से गोत्र की उत्पत्ति का प्रारंभ माना जाता है | जब गोत्रो का समूह एक समूह किसी कारणवश एक साथ मिल जाता है तो उस नवोदित समूह को गोत्र समूह या भातर समूह(बह्भाई) कहते है |
कभी- कभी गोत्र तथा वंश को समान अर्थ में समझ लिया जाता है परन्तु वास्तव में इन दोनों में प्रचुर मात्र में भिन्नता है | वंश का पूर्वज एक वास्तविक व्यक्ति होता है जिसका पता लगाया जा समता है, जबकि गोत्र का पूर्वज काल्पनिक भी हो सकता है | वंश के सदस्य परस्पर रक्त संबंधी होते है, किन्तु गोत्र में वे संबंधी ही समझे जाते है तथा वंश-समूह में जो महतवपूर्ण समानता है वह यह है की वंश-समूह तथा गोत्र दोनों ही एकपक्षीय होते है |आदिवासियों को एक संगठन के रूप में बनाये रखने तथा उनकी कुछ पारस्परिक विशिष्टताओ को कायम रखने में गोत्र का प्रमुख महत्त्व रहा है |गोत्र आदिवासियों में पारस्परिक सहायता एवं सुरक्षा देना ,समूह पर नियंत्रण रखने,बंधुत्व बढ़ाने,बहिर्विवाह,कबीला नियमो का पालन के रूप में विधिक कार्य,धार्मिक जुडाव,मुखिया के रूप में शासन कार्य का कार्य करता है | प्रत्येक गोत्र के एक या अधिक गण-चिन्ह (टोटम) होते है | गण-चिन्ह पवित्र वस्तु के रूप में मन जाता है | उसकी पूजा एवं आराधना की जाती है या मान सम्मान या आदर किया जाता है | जैसे ''मीना'' आदिवासियों में 200 से अधिक गोत्र है जो की पेड़-पोधें,जानवर,स्थान,घटना तथा अन्य भोतिक पदार्थों के नाम से जाने जाते है | संथालो में 100,हो में 50,मुंडा आदिवासियों में 64,भीलों में 24,गोंडो में 40-50 गोत्र है जो पेड़ पोधो,जानवरों के नाम से है | मीना आदिवासियों में कुल 5200 गोत्र,12 पाल (क्षेत्र विशेष में विशाल समूह ) और 32 तड़ है | मीना आदिवासियों में ''धराड़ी'' के रूप में एक विशेष प्रथा जिसमे प्रत्येक गोत्र एक पेड़ या पौधे को कुल वृक्ष के रूप में पूजते है परिवार का सदस्य मानते है | इस समुदाय का गण -चिन्ह ''मीन'' (मछली,मत्स्य ) है |जिसे की प्रारंभिक जिव माना जाता इससे इनकी प्राचीनता प्रकट होती है | अतः आदिवासियों का प्रकृति से प्रगाढ़ सम्बन्ध रहा है या यो कहे वो प्रकृतिमय है |

टोटम (गण -चिन्ह ):-सर्व प्रथम इस शब्द का प्रयोग जे.लाँग ने 1791 में उत्तरी अनेरिका की जनजातियो के लिये किया था | ''टोटम'' एक पदार्थ -प्राय: एक पशु अथवा एक पौधा है जिसके प्रति एक सामाजिक समूह के सदस्य विशेष श्रध्दाभाव रखते है तथा जो यह अनुभव करते है की उनके तथा टोटम के मध्य भावात्मक समानता का एक विशिष्ट संबंध है | गोत्रं में विभाजित अनेक जनजातियो में गोत्र का नाम एक पशु,पौधा अथवा एक प्राकृतिक पदार्थ से लिया गया है तथा गोत्र की सदस्य इन पशुओ अथवा वस्तुओ के प्रति विशिष्ट मनोभाव रखते है जिसे नृतत्व विज्ञानवेत्ता ''टोटम'' कहते है |टोटम के प्रति विश्वास अथवा संस्थागत अभिव्यक्ति ही टोटम वाद है |

'' टोटम'' प्रथाओं तथा विश्वासों का समूह है जिसके दुवारा समाज एवं पशुओं,पौधों तथा अन्य प्राकृतिक वस्तुए, जो की सामाजिक जीवन में महतवपूर्ण है, के मध्य संबंधों की एक विशेष व्यवस्था स्थापित हो जाती है | इस पर कई प्रथाए चल; जाती है -जैसे टोटम-संबधी जिव को नहीं मारना ,यदि टोटम वृक्ष है तो उसके फल न खाना,उसको न जलाना न काटना,तथा उसे हानि न पहुँचाना,टोटम ''प्राणी'' की मृत्यु पर शोक प्रकट करना आदि | यही बाह्य समूह टोटम को हानि पहुंचाता है तो लोग सम्मिलित रूप से उसका विरोध करते है तथा ऐसा करने पर उस व्यक्ति अथवा समूह को दंड देते है | जैसे मीणा समुदाय में धराड़ी प्रथा का प्रचलन है हर गोत्र का टोटम एक पेड़,पौधा,पशु,जिव है धराड़ी का शाब्दिक अर्थ धरा +आड़ी अर्थात धरा(पृथ्वी) की रक्षा करने वाली होता हैं | प्रकृति (पेड़ -पौधे ) जो आदिम काल से आदिम कबीलों की पालनहार रही है | उसके साथ आदिवासी कबीलों का नाता माँ बेटा का रहा है | वे प्रकृति में अपनी मात्रदेवी का निवास मानकर उसे आराध्य एवं अपने काबिले का अंश -वंश,संरक्षक व परिवार का अभिन्न अंग मानकर पूजते है | हर शुभ कार्य में साथ रखते है,प्रकृति का आदिवासियों से यह नाता " धराड़ी प्रथा कहलाती है | संक्षिप्त में पेड़ -पौधों (प्रकृति ) के प्रति आदिवासियों का मानवीय, पारिवारिक , मित्रवत व्यवहार और उसके प्रति सम्मान ही " धराड़ी प्रथा है | मीणा लोग अपने गोत्र के पेड़ को न काटते है न जलाते है न किसी और को काटने देते है इन पर प्राचीन काल में कई कबीलाई युध्द भी हुए है | मीना समुदाय का समूह गण चिन्ह मीन रहा है मासाहारी होते हुए भी मीन (मछली ) को कभी नहीं खाते | इसी गण चिह से इस समुदाय का नामकरण हुवा है |ऐसे टोटम से अन्य आदिवासियों का गहरा संबंध रहा है | अतः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है की आदिवासियों की गोत्र और टोटम प्रथा आदिम प्रकृति धर्म से जुडाव की महतवपूर्ण कड़ी है |..आपके विचारो का स्वागत है !!!
PN बैफलवात जी के आलेख से

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