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बुधवार, 27 नवंबर 2019

मीणा इतिहास का स्पंदन

राजस्थानी वीर काव्य का यह स्फुट गीत जो मुझे मीना इतिहास से मिला जो चारण भाषा में था , मैंने उसका हिन्दी अनुवाद जानने की कोशिस की , जितनी बुद्धि थी और जितनी राजस्थानी की समझ थी मैंने उसका अर्थ किया लेकिन सम्पूर्ण अर्थ करने में मैं असमर्थ था । ऐसे में  मैने अपने कवि  मित्रों से सहायता लेनी की ठानी जो राजस्थानी के परम विद्वान  हैं । मेरे मित्रों में ऐसे विद्वान काफी थे लेकिन मैंने एक विद्धत व्यक्तित्व को चुना जिनका नाम था   श्री मोहनपुरी। मोहन पुरी जी ने इसे अनुवाद के लिये भेजा  श्री गिरधरदान रतनू जी के पास। रतनू जी खुद चारण परिवार से है  प्राचीन काव्य के बिशेषज्ञ हैं।  आदरणीय रतनू जी ने इस गीत का सरल हिन्दी अनुवाद करके मुझे उपलब्ध करवा दिया है । इस सम्बन्ध में रतनू जी के उद्गार भी पढने योग्य हैं जो इस पद को प्राप्त करने के बाद उन्होंने मीडिया से कहे...उन्हीं का वक्तव्य आगे देखें...
''*गीत सांगा मैणा रो-*
*कल्याण दास गाडण कहै* -

''17वीं शताब्दी के श्रेष्ठ कवि महकरण मेहडू उर्फ जाडा मेहडू जो अपने समय के निर्भीक व बेबाक कवि के रूप में साहित्यिक जगत में विश्रुत है।इन्हीं के पुत्र कल्याणदास मेहडू भी श्रेण्य कवि माने जाते हैं।कल्याणदास मेहडू मारवाड़ ,मेवाड़ व बीकानेर आदि रजवाड़ों में समादृत थे।इन्होंने किन्हीं सांगा मैणा/मीणा की वीरता को रेखांकित करते हुए एक गीत कहा।सांगा ने परिहारों व पमारों के बीच हुए किसी युद्ध में भाग लेकर अपना अदम्य साहस दिखाया था।जिसे कवि ने अपनी वाणी से अमर कर दिया।
इससे यह सिद्ध है कि चारण कवि वीरता के पूजारी थे।उनके लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि वीरता दिखाने वाले की जाति क्या है?वो तो केवल गुणग्राही थे।निसंदेह उन कवियों ने जातिवाद से ऊपर उठकर रचनाएं की लेकिन अपरिहार्य कारणों से रचनाएं संकलित सही रूप में नहीं हो पाई।आज हम जब निष्पक्ष रूप से अगर डिंगल गीतों का अध्ययन करें तो हम पाएंगे कि वीर राजपूतों के साथ जो- जो लोग वीरता से लड़ें उनके गीत फुटकर मात्रा में उपलब्ध हैं।।इससे यह तो सिद्ध होता ही है कि जो आरोप चारण कवियों पर गढ़े व मढ़े जाते हैं वे निराधार व निर्मूल है ।जरूरत है बिना किसी पूर्वाग्रहों के ऐसे गीतों व गीत नायकों के अनुसंधान की।''
उक्त गीत मोहनपुरी जी, जो कि हिंदी- राजस्थानी के उम्दा रचनाकार हैं से साभार प्राप्त हुआ- उन्हें ये गीत सर विजय सिंह मीना जी ने भेजा था अनुवाद के लिए जैसा कि उनसे बाद में मेरी सोसल मीडिया के द्वारा बात हुई ।

---- *गीत मैणा सांगा रो*---
----कल्याण दास जाडावत कहै,
कड़िबांधी तणो भरोसो करतां,
तीन च्यारि लागी तरवार।
'सांगला' तणी कटारी साची,
मारणहार राखियो मार।।

बहिये खाग पछै उर वाहि,
जोर उकसी मोर जुई।
मैणा तणी जमाल़ी समहरि,
हुबतै चूक अचूक हुई।।

पडती बाथ साथ पल़टंते,
हाथ बखाणि बखाणि हियो।
मारण मारण मारके मैणे,
कूढ उपने साच कियो।।

इल़ परिहार पमार अखाडै,
खिंव भुज बहै कटारी खाग।
मुख कर राग थाटियो मैणी,
रावताणी गायो सुजि राग ।।

सांगा, जो कि अपनी कड़बंध अर्थात तलवार पर हमेशा भरोसा रखता था यानी जिसे अपनी प्रहार क्षमता पर पूरा विश्वास था।भलेही उसे तीन चार प्रबल प्रहारों का सामना करना पड़ा लेकिन ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसने अपनी कटार के वार से उस दुश्मन को मार गिराया जो उसे मारने को उद्धत था

दुश्मन के प्रहार करने के बाद क्रोधित होकर युद्धस्थल पर सांगा ने जोश में भरकर उसके अंतस्तल प्रहार करने हेतु कटारी निकाली जिसे उस अरि ने देखा लेकिन वो अपना बचाव नहीं कर सका क्योंकि सांगा का प्रहार अचूक था उससे बचना किसी का भी असंभव था। अतः उसकी कटारी ने शत्रु के हृदय को भी विदीर्ण कर दिया।

अपने साथियों को बदलते देख यानी सहायतार्थ उत्साहित न देखकर उसने रिपु को अपने बाहुपाश में जकड़ लिया ।उस समय उसके दुश्मनों व साथियों ने उसके आत्मबल व बाहुबल दोनों को प्रशंसनीय माना । उस कीर्ति को उसने यथार्थ कर बताया यानी जो उसे मारना चाहते थे उसको इस 'कूढ' में जन्मे साहसी मीणे ने मार दिया।

इस अवनी पर परिहार व पमार युद्धार्थ भिड़े।उस समय उसकी कटारी ने बिजली के सदृश चमकते हुए जो प्रखरता दिखाई उसके कारण उसकी मा अर्थात उस जननी मैणी(स्त्रीलिंग) की शोभा सर्वत्र फैली तो साथ ही उस रावताणी अर्थात राजपूतनी ने भी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जिसके पुत्रों अथवा पुत्र के कारण वो लड़ा।''
''गिरधरदान रतनू दासोड़ी'
इस अनुवाद के प्राप्त होने के बाद रतनू  जी से भी मेरी विस्तार से बात हुई और उन्होंने इच्छा जाहिर की कि आप इस पर एक ग्रंथ लिखें, उन्होंने इसका सन्दर्भ भी जानने की कोशिस की जिसके लिए  मैं प्रयासरत हूं। मीना जाति इतनी योद्धा जाति रही है लेकिन इस पर वर्तमान में कोई क्यों नहीं लिख रहा ? ये प्रश्च चिन्ह हर व्यक्ति करता है जो बौद्धिक समाज से  जुडा  है, चाहे वो हमारे समाज से हो या मुख्यधारा के समाज से हो?
जिस समाज का बौद्धिक वर्ग , पढा लिखा वर्ग या अगुवा वर्ग ही जब अपने इतिहास , संस्कृति और अपने लोक से मुंह मोडने लग जाये तो समझो ऐसे समाज को न अवतार बचा सकते हैं , न पयम्बर बचा सकते हैं और न ही कैपटिलिज्म की अंधी दौड?? 

Pay back to society ये भी होता है, केवल उसे क्षणिक मिशनों में ही न बांधे। 
जब हम इस देश पर नजर डालते हैं और अपने आपको उस पैमाने में रखते हैं तो फिर मुझे ये शेर लिखना पडता है--
'' उस तरफ देख चांद निकला है ,
 इस तरफ सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है।
चलो उस तरफ ही चलें जहां चांद निकला है,
वहीं से चांद की किरणें उधार ले आयें।''
विगत  हजारों साल से यही हो रहा है।
(विजय सिंह मीना)
( चित्र साभार भाई देवदास अभिषेक  शिक्षक )

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