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शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

धराड़ी प्रथा क्या है

वर्तमान में उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पीढ़ी के अधिकांश साथियों को तो ये भी पता नहीं है, कि धराड़ी क्या है? 
धराड़ी प्रथा का अर्थ➡️
धराड़ी का शाब्दिक अर्थ है धरा + आड़ी अर्थात् धरा (पृथ्वी) की (आड़ी / रखवाली या रखवाड़ी) रक्षा करने वाली होता है!
प्रकृति (पेड़ -पौधे ) जो आदिम काल से आदिम कबीलों की पालनहार रही है! उसके साथ आदिवासी कबीलों का नाता (संबंध) माँ-बेटे का रहा है! वे #प्रकृति में अपनी मातृदेवी का निवास मानकर उसे अपनी आराध्य एवं अपने कबीले की अंश-वंश, संरक्षक एवं परिवार का अभिन्न अंग मानकर सदियों से पूजते आ रहे हैं! हर शुभ कार्य में साथ रखते हैं, प्रकृति का आदिवासियों से यह नाता  "धराड़ी प्रथा''  कहलाती है! संक्षिप्त में पेड़-पौधों (प्रकृति ) के प्रति आदिवासियों का #मानवीय, #मित्रवत, #पारिवारिक व्यवहार और उनके प्रति सम्मान ही "धराड़ी प्रथा'' है! 
मातृ देवी या धराड़ी का संबंध दुनिया की सृष्टा या उत्पादन करने वाली देवी के साथ है, जिसे हम धरती माता या भूमाता भी कह सकते हैं!
धराड़ी या मातृ देवी की उपासना सर्वाधिक प्राचीन है!
आदिवासी #मीणा समुदाय की धराड़ी प्रथा और पर्यावरण संरक्षण➡️
आदिवासी मीणा समुदाय में 5248 गोत्र बतलाए गये हैं, जिनमें से लगभग 1200 गोत्र वर्तमान में अस्तित्व में हैं! मीणा समुदाय के प्रत्येक गोत्र की एक धराड़ी होती है, जिसे #कुलवृक्ष कहते हैं! कई गोत्रों की धराड़ी एक हो सकती है! जिसका हमने आर्य संस्कृति के संपर्क और प्रभाव में आकर मूर्तिकरण कर दिया! लेकिन #कुलदेवी या #कुलदेवता के स्थान पर संबंधित गोत्र की धराड़ी (कुल वृक्ष) का होना और उसकी पूजा करना पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत बड़ा संदेश देती है! 

 प्राचीनकाल में धराड़ी का महत्व➡️
१➡️बच्चों के जन्म पर गोत्र की धराड़ी (कुल वृक्ष) का पत्ता या लकड़ी बिस्तर के सिरहाने रखते थे! 
२➡️विवाह के समय धराड़ी (कुलवृक्ष) के ही चारों ओर फेरे लिये जाते थे! किसी पंडित की कोई जरूरत नहीं होती थी! कालांतर में आर्यों के संपर्क और प्रभाव में आकर धराड़ी की लकड़ी की अग्नि को साक्षात् प्रकृति स्वरूपा मान कर फेरे लिए जाने लगे लेकिन अब हम उसको भी भूलते जा रहे हैं! 
३➡️मृत्यु के समय अंतिम संस्कार भी धराड़ी (कुल वृक्ष) की लकड़ी से ही किया जाता था! आज उसकी एक लकड़ी को केवल नियम के तौर पर अंतिम संस्कार में प्रयोग किया जाता है! 
४➡️संबंधित गोत्र अपने कुल वृक्ष (धराड़ी) को लगाने और संरक्षण का ही काम करता था! उनके द्वारा उसकी गीली लकड़ी काम में नहीं ली जाती थी! जब धराड़ी की कोई शाखा सूखती थी, तभी काम में ले सकते थे वो भी खाना बनाने के लिए नहीं, केवल विशेष अवसरों पर ही! 

आगामी #विश्व_आदिवासी_दिवस 9 अगस्त पर सभी आदिवासी मीणा समुदाय के लोग अपनी-अपनी धराड़ी को बचाने का प्रण लें! तथा अधिक से अधिक अपने-अपने गोत्र की धराड़ी (कुल वृक्ष) का #रोपण एवं #संरक्षण करें! यही सच्चे अर्थों में आपके द्वारा विश्व आदिवासी दिवस मनाने की सार्थकता होगी! कुल वृक्ष के साथ ही अधिक से अधिक फलदार और छायादार पेड़ भी लगाएं! तथा उनका संरक्षण भी करें उनको समय-समय पर पानी देते रहें! 
आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि प्रत्येक गोत्र के द्वारा एक वृक्ष को अपना कुलवृक्ष मानते हुए उसको लगाने ओर संरक्षण का कार्य किया जाता होगा तो पर्यावरण का कितने विशाल स्तर पर संरक्षण होता होगा! 

कुछ गोत्रों की धराड़ी इस प्रकार है - 
#घुणावत गोत्र - धराड़ी #नीम
#घुसिंगा गोत्र - धराड़ी #गिरीजाड़ (जाल या जाड़)
#मंडावत गोत्र - धराड़ी #बेल का वृक्ष
#सिर्रा गोत्र - धराड़ी #सेमल वृक्ष! 
किसी की धराड़ी जाड़ है, किसी की आम है, किसी की पीपल है, तो किसी की खेजड़ी! 
अगर आपको अपनी धराड़ी (कुल वृक्ष) का पता है, तो आगामी विश्व आदिवासी दिवस पर उसका रोपण अवश्य करें!
अगर आपको पता नहीं है तो अपने कबीले के बडे़ बुजुर्गों से सही जानकारी अवश्य प्राप्त करें!
नोट ➡️ अपने-अपने गोत्र की धराड़ी (कुल वृक्ष) का नाम कमेन्ट में अवश्य लिखें! 
जोहार #आदिवासियत!! 
जोहार #सगाजनों!!
जय धराड़ी!! 
जय प्रकृति!!
जय संस्कृति!! 
 
     🔥जोहार🔥
✍️मुनेश पीलौदा

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