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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

संविधान दिवस पर मुद्दा है अपने अपने मंदिर!

आज संविधान दिवस है ; मुद्दा है अपने अपने मंदिर! ।
• इस दिन का महत्त्व ; हम सब जानते हैं कि दिनांक 26 नवंबर, सन 1949 के दिन भारत का संविधान तैयार हुआ था. इसीलिए आज की इस तिथि को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है. 
संविधान की प्रस्तावना:
हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं.
• भारतीय संविधान द्वारा स्थापित प्रमुख मूल्य; 
न्याय; सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक स्वतंत्रता ; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म व उपासना 
समता; प्रतिष्ठा व अवसर 
बंधुता; व्यक्ति-गरिमा, राष्ट्रीय एकता व अखंडता 
संविधान में पहला शब्द है ‘हम’. आश्चर्य है कि हम भारत के लोग उस ‘हम’ से लगातार ‘मैं’ की और बढे जा रहे हैं.
• संविधान सभा की बैठक में दिया गया आंबेडकर साहब का अंतिम वक्तव्य : 25 नवम्बर, 1949
ऐसा नहीं है कि भारत में प्रथम बार गणतंत्र की स्थापना होने जा रही, हमारे यहाँ प्राचीन काल में लोकतंत्र था जिसे जनपदों व गणराज्यों एवं बौद्ध संघों में देखा जा सकता है. हम यहाँ आधुनिक प्रजातंत्र की स्थापना करने जा रहे हैं. अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने तीन चेतावनियाँ दी थीं ; प्रथम; अपनी मांगों के लिए संवैधानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल, न कि जनाक्रोश, आन्दोलन व क्रांतिकारी तौर-तरीके.   ये सब अराजकता की श्रेणी में आते हैं. दूसरी; चाहे कितना भी सशक्त और चमत्कारी राजनैतिक नेतृत्व हो, उसके प्रति ‘भक्ति भाव’ अथवा ‘व्यक्ति-पूजा’ लोकतंत्र के पतन एवं अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त करेगा. हमने यह आपातकाल में देखा और हम यह इस वर्तमान में देख रहे हैं. तीसरी; सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना. भारतीय परम्परा वर्ण-व्यवस्था एवं जातिवाद के कारण सामाजिक-आर्थिक असमानता की रही है. राजनैतिक प्रजातंत्र की भांति इन क्षेत्रों में भी ‘एक व्यक्ति एक वोट’ की तर्ज़ पर ‘एक व्यक्ति एक मूल्य’ के सिद्धांत को लागू करना होगा, अन्यथा राजनैतिक प्रजातंत्र खतरे में पड़ जायेगा.
• आज राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में जो कुछ घटित हो रहा है उसे देखते हुए संविधान के असली रखवालों की तरफ हमारा ध्यान जाना ही चाहिए. तनिक निम्न पैराग्राफ़ पर गौर किया जाये;
बस्तर संभाग के जगदलपुर जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर तोकापाल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले बुरुंगपाल गांव में यहां के आदिवासियों ने संविधान का मंदिर बनाया है, जिसे स्थानीय भाषा में लोग 'गुड़ी' कहते हैं. इस मंदिर में संविधान की पूजा की जाती है. यह गांव देश का अकेला ऐसा गांव है, जहां संविधान का मंदिर स्थित है. यह कोई भव्य मंदिर नहीं बल्कि एक आधारशिला है, जिस पर संविधान में निहित आदिवासी क्षेत्रो में पांचवी अनुसूची के प्रावधान और अधिकारों को लिखा गया है. 6 अक्टूबर 1992 को जब इसकी आधारशिला रखी गई थी तब से ग्रामीण इसे ही मंदिर समझते हैं और इसकी सेवा-पूजा करते हैं. उसी दिन इस इलाके के मावलीभाटा में एसएम डायकेम के स्टील प्लांट का शिलान्यास हुआ था. आदिवासियों ने इस स्टील प्लांट के खिलाफ एक आंदोलन किया. इसके बाद यह मंदिर स्थापित हुआ. एसएम डायकेम के स्टील प्लांट के जमीन अधिग्रहण को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका लगाईं गई थी. याचिका का फैसला ग्रामीणों के पक्ष में आया. जिस दिन यह फैसला आया, उसी दिन को ग्रामीण विजय उत्सव के रूप में यहां एकजुट होकर मनाते हैं. यहां संविधान में निहित पांचवी अनुसूची लागू है, जो कि भारत सरकार अधिनियम 1935 की अनुच्छेद 91 और 92 की मूल आधार पर बनी है. उस वक्त प्लांट के विरोध में आदिवासी लामबंद हुए थे. आंदोलन की अगुवाई यहां कलेक्टर रह चुके डॉ. बी.डी. शर्मा ने की थी. उन्होंने इस आन्दोलन की रूपरेखा तय की थी.
विश्व भर के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े संविधान को सलाम! 
 
चित्र : संविधान का मंदिर
साभार हरिराम मीणा

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