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करौली का हॉस्टल

गाँव से शहर तक (संस्मरण)
करौली का छात्रावास
(मैं बहुत ही श्रृद्धा और गर्व के साथ हमारे वार्डन आदरणीय प्रकाश चन्द्र जी पाँडे का स्मरण कर रहा हूँ, जो सशरीर इस दुनिया में नहीं हैं, किन्तु मेरी चेतना में वे सदैव रहेंगे. उन्होंने 'पहाड़ों से मैदान तक' शीर्षक से एक पुस्तक लिखी है, जिसके पृष्ठ सं० 88 पर मेरा जिक्र है. एक विद्यार्थी के लिए गुरु की तरफ से इससे बड़ा और क्या आशीर्वाद होगा!) 
जब मैं राजकीय महाविद्यालय करौली में पढ़ाई कर रहा था तब समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित आदिवासी छात्रावास में रहा जो शहर के हिंडोन गेट से के पास हुआ करता था. रियासती ज़माने की यह एक हवेलीनुमा ईमारत थी, जिसका सदर दरवाज़ा बहुत बड़ा था. पहली मंजिल का आधा हिस्सा वार्डन के आवास के रूप में काम आता था. प्रथम मंजिल पर पाँच कमरे. दूसरी मंजिल पर मैस व अन्य सुविधाएँ तथा तीसरी मंजिल पर चार हॉल एवं दो बड़े कमरे हुआ करते थे. पूरी ईमारत लाल पत्थरों की बनी हुई थी. प्रस्तर-पट्टियों को लोहे की प्लेटों व कीलों से इस तरह जोड़ रखा था कि सीमेंट या किसी अन्य लेप की आवश्यकता ही न पड़े. भीतर की ओर दीवारें, टांड, छत, गवाक्ष, आलमारी, रोशनदान, दीपालय, खूंटियां तथा बाहर की तरफ प्रवेश-द्वार, झरोखे, ठुड्डे, पिनाले आदि सब इसी शील्प के आधार पर निर्मित किये गये थे. उस भवन में कुलमिलाकर 25-30 छात्र रहते थे. छात्रावास में दाखिला विशुद्ध रूप से मेरिट पर आधारित था. छात्रावास में सभी छात्र मीणा आदिवासी परिवारों से थे जो छात्रवृत्ति मिलती उसमें से भी कुछ न कुछ बचाने की जुगत में रहा करते थे. उनमें से अधिकांश ग़रीब घरों से थे. मुझे बाप ने क़र्ज़ ले ले कर पढाया था. मैंने गरीबी को बहुत निकट से देखा था. छात्रावास का वार्डन पी.सी. पांडे नामक व्याख्याता था. बहुत नेक, बुद्धिजीवी, शिक्षा को पूर्ण रूप से समर्पित. सपत्नीक वार्डन की जिम्मेदारी संभालता था.
‘तुम गिनेचुने छात्रों को अवसर मिला है पढने का. अच्छे से पढाई करोगे तो बढ़िया नौकरी मिलेगी. अपना, अपने माँ-बाप और गाँव का नाम रोशन करोगे. जिंदगी सफल हो जायेगी.’ उस वार्डन के ये शब्द आज भी मेरे दिमाग में गूंजते हैं. बेहद प्रेरणादायी उपदेश दिया करता था वह वार्डन. वह अल्मोड़ा का रहनेवाला था. पतला-लम्बा. गोरा-चिट्टा. उसके चेहरे से सौम्यता झलकती थी. जब वह बोलता तो सबकी इच्छा होती कि इसे सुनते ही रहा जाये. उसकी पत्नी भी उस जैसी सुन्दर थी बाहर से और भीतर से. दोनों संगीत के शौक़ीन थे. सप्ताह में एक बार संगीत संध्या का आयोजन उनके निवास पर हुआ करता था. तब वे दोनों छात्रों को गाने के लिये प्रेरित किया करते थे. असल में तो गाने के बहाने आत्मविश्वास उत्पन्न करना चाहते थे, ताकि हम देहाती छात्रों का दब्बूपना नष्ट हो सके.
‘अरे, तुम तो बहुत अच्छा गाते हो. प्रेक्टिस किया करो, और निखार आयेगा. तुम्हारी आवाज़ बहुत अच्छी है.’ वार्डन पांडे के ये उद्गार थे जब बत्तीलाल नाम के एक छात्र ने विश्वास फिल्म का यह गीत गाया ‘चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया....’ वार्डन स्वयं व उसकी पत्नी दोनों ढोलक व हारमोनियम अच्छा बजाते थे. संगीत संध्या को गायन कार्यक्रम के पश्चात् चाय व पकौड़ी परोसी जाती थी.
छात्रवृत्ति की राशि अनावश्यक रूप से कहीं खर्च न हो जाये इस पर रोक लगाने के लिये वार्डन ने सभी लड़कों के बैंक खाते खुलवा दिये थे. पेंट व शर्ट का कपड़ा वार्डन की पत्नी बच्चों के साथ बाज़ार जाकर ख़रीदवाती थी. उन्होंने ही पहली दफ़ा टूथ-पेस्ट इस्तेमाल करना व जीभ साफ करना सिखाया. गाँव में कोई भी लड़का नीम या बबूल की दातून अथवा हाथों से बनाये गये नमक व कोयला के पाउडर के आगे नहीं बढ़ा था. सर्दी के दिनों में बहुत राहत मिली थी जब जीवन में पहली बार जर्सी या गर्म कोट पहना.
‘छोटू, तुम क्या क्रिकेट की टीम बनाओगे? क्या खिलाओगे इन्हें?’ वार्डन ने एक बार मैस के रसोईये को डांट मारी थी. उसके आठ बालक थे.
‘माई-बाप, ऊपरवाले ने जिसे चौंच दी है उसे चुगेरा भी वही देगा. पाँच साल से छोटे दो बालकों के अलावा मेरे सभी बेटे कोई न कोई काम करते हैं. घर में जितने बच्चे होंगे उतनी ही आमदनी बढ़ेगी.’ छोटू का यह अजीब अर्थशास्त्र सुनकर वार्डन को गुस्सा आता. वह बड़बड़ाता ‘बेवकूफ़ को कितना समझाता हूँ. कान में जूं तक नहीं रेंगती.’

चित्र - 1 : करौली शहर का दृश्य
चित्र - 2 : मेरे गुरूजी का आशीर्वाद
चित्र- 3 : गुरूजी का सचित्र परिचय जो उनकी पुस्तक पर उपलब्ध है.

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